Skip to main content

इन्तक़ाम (The Revenge)

इंतकाम
----------------
बहुत पुरानी एक कहावत अपने बुजर्गों से सुनने को मिली थी – “ज़र, ज़ोरु और ज़मीन, हर झगड़े की जड़ होते हैं।” सही बात भी है, क्यूंकि सोना (धन), स्त्री या भूमि के कारण ही आज कि तारीख में भारतीय न्यायालयों में मुकदमे भरे पड़े हैं। मुझे अचानक इस कहावत कि याद इसलिए आई क्यूंकि मैं आज ही “इंतकाम” उपन्यास पढ़ कर हटा हूँ। मैं सोचने पर मजबूर हुआ कि क्यूँ नहीं विक्रम गोखले जैसे शख्स को फांसी कि सजा मिल जाए। भले ही बाद में वह बेक़सूर साबित हो जाए।



विक्रम गोखले, मुंबई में एक गाइड के रूप में फ्रीलांसर काम करता था। कहने को तो वह शादीशुदा था लेकिन अपनी पत्नी से अधिक उसे दूसरी औरतों में लगाव था। अगर सिर्फ जिस्मानी तौर पर लगाव रहता तो बात दूर थी, वो तो उनसे धन ऐंठने से भी बाज नहीं आता था। मतलब उसने “जड़ और जोरू” से दो-दो हाथ करने शुरू कर दिए थे। इंसान की एक खासियत है कि उसे पूरा पंचतंत्र याद हो, उसे पूरा मदभगवद गीता याद हो लेकिन वह इनमे प्रस्तुत किये गए जीवन मूल्यों को अपनी जिन्दगी में कभी लागू नहीं करता बल्कि इनका वह इस्तेमाल हमेशा दूसरों को सलाह देने में लगाता है। ऐसे ही विक्रम गोखले को पता था की, ३१ दिसम्बर कि रात से जिस लड़की के साथ वह है, उसे सर्वनाश कि ओर ले जा रही है।

नियति ने उसे कुछ संकेत तो दिए थे लेकिन जब वह एक शानदार, बेमिसाल स्त्री के साथ हो वो भी जिसने अपने शरीर पर शानदार और चमकीले आभूषण ग्रहण किये हुए हों तो, विक्रम गोखले क्या कोई साधू-महात्मा को भी पता नहीं चल पता की वह कौन से मकड़े के जाल में फंसे वाला है। वह पूनम देशमुख नाम कि शादी-शुदा लेकिन कड़क-जवान महिला के साथ तीन दिन से मौज-मस्ती कर रहा था कि कुछ ऐसे कारण बन पड़े जिससे उसे होटल छोड़ कर पूनम देशमुख के पति के याट में शरण लेनी पड़ी।

अगली सुबह जब विक्रम गोखले की नींद खुली तो उसे याट में पूनम कहीं नहीं दिखाई दी। उसे पूनम के खून से सने कपडे दिखाई दिए। पूरा केबिन उथल-पुथल दिखाई दिया। उसे वह तलवार भी नज़र नहीं आ रही थी जो दिखावे के लिए याट में रखा हुआ था। ऐसे समय पर विक्रम गोखले कि मत फिर मारी गयी और उसने उस केबिन में रखे पूनम देशमुख के जेवरात उठा के चलता बना। बाद में पुलिस ने विक्रम गोखले को पूनम देशमुख के क़त्ल के जुर्म में गिरफ्तार किया और सरकारी वकील संजीव कमलानी ने अदालत के सामने विक्रम गोखले को अपराधी साबित करके दिखाया। आखिरकार विक्रम गोखले को ज़र और ज़ोरु ने चारों खाने पटखनी दे दी और जिस नसीब पर वह पहले मुस्कराया करता था आज वह रो रहा था।

लेकिन बस यहीं इस कहानी का अंत नहीं है। असली थ्रिल तो इसके बाद शुरू होता है जब संजीव कमलानी को विक्रम गोखले की पत्नी से पता चलता है कि पूनम देशमुख जिन्दा है और गोवा में किसी नए नाम से रह रही है। उसी रात विक्रम गोखले की पत्नी कि हत्या हो जाती है जिसके क़त्ल के इलज़ाम में सरकारी वकील साहब फंस जाते हैं। यह भी कुछ कहावत से समबन्धित है क्यूंकि जब विक्रम गोखले की पत्नी शांता संजीव कमलानी को ऊँगली पकडाती है तो वह हाथ पकड़ कर आगे बढ़ जाता है जिसका अंत शांता के बेडरूम में होता है। शांता का कहना था कि उसका संजीव का साथ सोना विक्रम गोखले से लिया गया इंतकाम है। क्यूंकि विक्रम गोखले ने कभी उसे अपनी पत्नी माना ही नहीं लेकिन हक हमेशा जताया।

संजीव कमलानी अपने भाई कि सहायिका सिल्विया के साथ पूनम देशमुख कि तलाश में निकलता है और साथ ही साथ वह उस याट कि जांच भी करना चाहता है ताकि उसे पता चल सके कि याट में छुपने का या निकलने का कोई गुप्त स्थान तो नहीं है। संजीव कमलानी और सिल्विया के पीछे जितना पुलिस विभाग लगा हुआ था उतना ही उसमे दुसरे लोग भी इच्छुक लग रहे थे क्यूंकि वह एक गुर्दे मुर्दे को उखारने पर लगा हुआ था।

क्या संजीव कमलानी अपने ऊपर आयद क़त्ल के इलज़ाम को खारिज कर पायेगा? क्या वह विक्रम गोखले को फांसी के फंदे पर झूलने से बचा पायेगा? क्या वह पूनम देशमुख की तलाश कर पायेगा जिसको खुद उसने कोर्ट में मृत साबित किया था?

कहानी के कुछ ऐसे बिंदु हैं जो मैं आपको बाताना चाहूँगा जिससे आपको लगेगा कि आपको यह पुस्तक क्यों पढनी चाहिये:-

अगर पूनम देशमुख जीवित थी तो कैसे वो बंद याट में से निकल पायी थी।

अगर पूनम देशमुख जीवित थी इतने बड़े षड़यंत्र के पीछे का क्या उद्दयेश था और कौन इस इसमें शामिल था।

विक्रम गोखले को जानबूझकर बकरा बनाया गया था या वह बस यूँ ही फंस गया था।

कहानी का प्रस्तुतीकरण मुंबई से शुरू होकर गोवा तक खींचता जाता है।

कई ऐसे बिंदु सामने आते हैं जिनका कहानी के अंत से पहले खुलासा नहीं होता।

कहानी के किरदार वास्तविकता के करीब नज़र आते हैं।

वहीँ कहानी भी वास्तविकता के करीब नज़र आती है जिसमे घात, आघात और प्रतिघात का शानदार मिश्रण है।

वास्तविकता कि ओर इशारा करने के पीछे कारण यह है कि ऐसे धोखे आपको वर्तमान जीवन में रोज कहीं न कहीं देखने और पढने को मिल जाता है।

कहानी में कोई ऐसा भाग आपको ऐसा नहीं लगेगा जो व्यर्थ ही लिखा गया हो।

कहानी की प्रस्तुतीकरण शानदार है जैसे कि मकड़े ने अपने जाल को बहुत ही दिल लगाकर बुना हो जिसमे हम जैसे पढ़ कर फंसते जा रहे हैं और तभी निकलते हुए नज़र आते हैं जब अंत को पढ़ लेते हैं।

पाठक साहब ने उपन्यास में थ्रिल, मिस्ट्री और सस्पेंस का भरपूर इस्तेमाल किया है। यह आपको इसी बात से पता चल जाता है कि इसमें दो मर्डर हैं, चेज सीक्वेंस है, धमाकेदार क्लाइमेक्स है।

सन १९८१ में पहली बार इस पुस्तक का प्रकाशन हुआ था। सर सुरेन्द्र मोहन पाठक जी कुल उपन्यासों के क्रमागत श्रेणी में इसका स्थान १३१ वां आता है वहीँ थ्रिलर श्रेणी में यह १२ वां उपन्यास था। इस उपन्यास की कहानी एक ही जिल्द में समाई हुई है जिससे आपको और ज्यादा मजा आएगा।

आप इस पुस्तक को ईबुक में न्यूज़-हंट एप्लीकेशन पर भी पढ़ सकते हैं:-


आशा है, ये बिंदु आपको इस पुस्तक को पढने के जरूर मजबूर करेंगे। पूरा पुस्तक पढने के बाद आपको इस समीक्षा के आरम्भ में लिखी गयी कहावत के और उदाहरण देखने को मिल सकेंगे। 

Comments

Popular posts from this blog

कोहबर की शर्त (लेखक - केशव प्रसाद मिश्र)

कोहबर की शर्त   लेखक - केशव प्रसाद मिश्र वर्षों पहले जब “हम आपके हैं कौन” देखा था तो मुझे खबर भी नहीं था की उस फिल्म की कहानी केशव प्रसाद मिश्र की उपन्यास “कोहबर की शर्त” से ली गयी है। लोग यही कहते थे की कहानी राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म “नदिया के पार” का रीमेक है। बाद में “नदिया के पार” भी देखने का मौका मिला और मुझे “नदिया के पार” फिल्म “हम आपके हैं कौन” से ज्यादा पसंद आया। जहाँ “नदिया के पार” की पृष्ठभूमि में भारत के गाँव थे वहीँ “हम आपके हैं कौन” की पृष्ठभूमि में भारत के शहर। मुझे कई वर्षों बाद पता चला की “नदिया के पार” फिल्म हिंदी उपन्यास “कोहबर की शर्त” की कहानी पर आधारित है। तभी से मन में ललक और इच्छा थी की इस उपन्यास को पढ़ा जाए। वैसे भी कहा जाता है की उपन्यास की कहानी और फिल्म की कहानी में बहुत असमानताएं होती हैं। वहीँ यह भी कहा जाता है की फिल्म को देखकर आप उसके मूल उपन्यास या कहानी को जज नहीं कर सकते। हाल ही में मुझे “कोहबर की शर्त” उपन्यास को पढने का मौका मिला। मैं अपने विवाह पर जब गाँव जा रहा था तो आदतन कुछ किताबें ही ले गया था क्यूंकि मुझे साफ़-साफ़ बताया ग...

Man Eaters of Kumaon

समीक्षा  चोगढ़ के नरभक्षी बाघ  लेखक - जिम कॉर्बेट  हर जंग में मौत होती है। हर युद्ध में लाशें गिरती हैं। दोनों तरफ जान-माल का नुकसान होता है । दोनों तरफ के सैनिकों में जोश होता है, उत्साह होता है, लेकिन डर भी होता है है। लेकिन दोनों तरफ इंसान होते हैं। इंसान अपनी फितरत से पूरी तरह से वाकिफ होता है । सैनिको को यही शिक्षा दी जाती है की कौन तुम्हारा दोस्त है कौन तुम्हारा दुश्मन।  लेकिन अगर दुश्मन एक हो और उसमे भी नरभक्षी बाघ, जिसे सिर्फ और सिर्फ अपने शिकार से मतलब है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की शिकार मनुष्य है या जानवर। उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता की वह जिस मनुष्य का शिकार कर रहा है वह किसी का बाप, किसी का बेटा, किसी का पति, किसी की माँ, किसी की बेटी और किसी की पत्नी हो सकती है। उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता की उसके कारण किसी के घर में चूल्हा नहीं जलेगा, किसी के घर में शहनाई नहीं बजेगी, किसी के घर में त्यौहार नहीं मनाया जाएगा। उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता की उसके कारण लोग भय से अपने घरों से कई दिनों तक बाहर नहीं निकलते। उसे इस बात से फर्क ...

दुर्गेश नंदिनी - बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय

दुर्गेश नंदिनी  लेखक - बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय उपन्यास के बारे में कुछ तथ्य ------------------------------ --------- बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा गया उनके जीवन का पहला उपन्यास था। इसका पहला संस्करण १८६५ में बंगाली में आया। दुर्गेशनंदिनी की समकालीन विद्वानों और समाचार पत्रों के द्वारा अत्यधिक सराहना की गई थी. बंकिम दा के जीवन काल के दौरान इस उपन्यास के चौदह सस्करण छपे। इस उपन्यास का अंग्रेजी संस्करण १८८२ में आया। हिंदी संस्करण १८८५ में आया। इस उपन्यस को पहली बार सन १८७३ में नाटक लिए चुना गया।  ------------------------------ ------------------------------ ------------------------------ यह मुझे कैसे प्राप्त हुआ - मैं अपने दोस्त और सहपाठी मुबारक अली जी को दिल से धन्यवाद् कहना चाहता हूँ की उन्होंने यह पुस्तक पढने के लिए दी। मैंने परसों उन्हें बताया की मेरे पास कोई पुस्तक नहीं है पढने के लिए तो उन्होंने यह नाम सुझाया। सच बताऊ दोस्तों नाम सुनते ही मैं अपनी कुर्सी से उछल पड़ा। मैं बहुत खुश हुआ और अगले दिन अर्थात बीते हुए कल को पुस्तक लाने को ...