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खुशियों का कोई मेयार नहीं होता (The Necklace by Guy de Maupassant)

खुशियों का कोई मेयार नहीं होता मूल कथा - The Necklace मूल कथा लेखक -   Guy de Maupassant अनुवाद एवं भारतीयकरण – राजीव रोशन एडिटिंग – डॉ. सबा खान निम्न कहानी प्रसिद्ध फ़्रांसिसी लेखक Guy de Maupassant की एक मशहूर कहानी “द नेकलेस” का हिंदी एवं भारतीयकरण अनुवाद है। Guy de Maupassant को शोर्ट स्टोरी फॉर्मेट का मास्टर लेखक भी कहा जाता है। वे अपने कम शब्दों में लिखी कहानी से बहुत कुछ कह जाते थे। इस कहानी को अंग्रेजी में पढने के बाद मुझे एहसास हुआ की, मैं इसका हिंदी में अनुवाद कर सकता हूँ, भारतीय किरदारों के द्वारा भारतीय परिवेश में इसी कहानी को पेश कर सकता हूँ। आशा है, मेरी यह छोटी सी कोशिश रंग लाएगी और आप सभी को पसंद आएगी। इस कहानी की एडिटिंग करने के लिए, मैं सबा खान जी का शुक्र गुजार हूँ। आशा है, भविष्य में आने वाले, मेरे दुसरे प्रोजेक्ट्स में भी वे मेरी सहायता करेंगी और साथ-ही-साथ प्रोत्साहित भी करती रहेंगी। २२ जून सिद्धार्थ ने घर में घुसते ही आवाज़ लगाई – “जान, मेरी जान, कहाँ हो?” सिद्धार्थ ने देखा कि कविता खिड़की से बाहर देख रही थी। बाहर अभी-अभी मूसला...

64 नंबर (कहानी)

64 नंबर मैं असमंजस में इन्द्रप्रस्थ मेट्रो स्टेशन के फुटओवर ब्रिज के नीचे खड़ा था। असमंजसता इस बात की थी कि मैं अपने गंतव्य स्थान पर जाने के लिए ऑटो पकडूँ या कैब बुलाऊं। एक बार को तो यह सोचा की जाकर अपने बॉस को बोलता हूँ की मुझे वहां नहीं जाना, वहां किसी और को भेज दे। लेकिन फिर यह भी सोचा की, कोई और भी जाएगा तो उसके हालात ऐसे ही होंगे। ऐसा नहीं है की मैं बहुत डरपोक इंसान हूँ, एक्चुअली मैं डरपोक इंसान हूँ। मैंने कहीं पढ़ा था की इंसान के अन्दर डर नामक चीज का निवास होना जरूरी है। जिस इंसान में डर नाम की संवेदना नहीं होती वह इंसान इंसान ही नहीं होता। खैर, मैं डर नहीं रहा था, शर्मा रहा था, लजा रहा था। लज्जा सिर्फ स्त्रियों के पाले में ही ईश्वर ने नहीं बख्शा है, पुरुषों के अन्दर भी लज्जा होती है बस फर्क यह है की इसका प्रदर्शन नहीं करते हैं और न ही कभी कन्फेस करते हैं। मैं, दिल्ली शहर में नया-नया कबूतर था, इससे पहले मैं यूनिसेफ के श्रीनगर ब्रांच में कार्यरत था। लगभग वहाँ ४ वर्ष नौकरी करने के पश्चात, मेरे काम में अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए, मुझे दिल्ली ट्रान्सफर किया गया था। दिल्ली आते ही...

लघु-कथा - "कटघरा"

लघु-कथा - "कटघरा" "......जज साहब मैंने यह अपराध नहीं किया है! नहीं किया है। नहीं किया।" यही आवाज मेरे गले से बार बार निकल रही थी। मैं हर बार यही दोहराए जा रहा था। लेकिन ऐसा लग रहा था की जज साहब को मेरी बातों से ज्यादा उन सबूतों पर यकीन है जो मेरे खिलाफ दिए गए हैं। जज साहब ने कहा " अगर तुम्हे किसी वकील की जरूरत है तो सरकार तुम्हे वकील मुहैया कराएगी" मेरे चेहरे पर कठोरता के भाव आ गए। पता नहीं क्यूँ मेरा कानून और कानून की उस देवी पर से भरोसा उठ गया था। ऐसा लग रहा था की मेरे अन्दर नफरत की ज्वालामुखी सुलग रही है और कभी भी फुट सकती थी। लेकिन मैंने खुद को संभाला। कभी कभी भावनाओं के बहाव में इंसान अपना संयम  खो देता है। मैं भी उसी बहाव में बहता जा रहा था। मैंने किसी तरह अपने आप को रोक। मेरे ऊपर इलज़ाम ही तो लगाया गया है। मैं अभी इस इलज़ाम को झुठला सकता हूँ। मैं अभी भी इस अपराध से मुक्त हो सकता हूँ। मैंने जज साहब की ओर चेहरा किया और बोल, "जज साहब, मुझे कोई वकील नहीं चाहिए। मैं अपनी पैरवी स्वयं करूँगा। मैं नहीं सोचता की मेरे पारिवारिक मामलों में कोई...