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दशाराजन- ऋग्वेद में वर्णित दस राजाओं के युद्ध की गाथा

पुस्तक - दशाराजन
लेखक - अशोक के. बैंकर



हाल ही में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में मेरी कई हाजिरियां दर्ज हुई। इस बार बहुत सी पुस्तकों ने मुझे आकर्षित किया, जिनमे से एक थी अशोक के. बैंकर के नयी पुस्तक “दशाराजन”। “Ten Kings” के नाम से अंग्रेजी में प्रकाशित पुस्तक, मंजुला प्रकाशन द्वारा हिंदी में अनुवादित एवं प्रकाशित हुई जिसका नाम “दशाराजन” है। अमूमन मैं “क्राइम फिक्शन” को पढना बहुत पसंद करता हूँ और बहुत पहले से पढता आया हूँ। अशोक बैंकर जी के बारे में प्राथमिक जानकारी भी मुझे क्राइम फिक्शन कि दुनिया के द्वारा ही हुआ। इन्टरनेट पर सर्च करने के दौरान कई सालों पहले मुझे अशोक बैंकर जी के बारे में जानकारी प्राप्त हुई थी। अशोक बैंकर जी ने भी नब्बे के दशक में लगभग तीन क्राइम थ्रिलर लिखे थे। बस उसके बाद से मैं उनके द्वारा लिखे गए क्राइम थ्रिलर और माय्थोलोजिकल सीरीज भी पढना चाहता था।

अशोक बैंकर जी कि पुस्तक ज्यों ही मैंने पुस्तक मेले में देखी त्यों ही मैं उसे खरीदने लगा तब मेरे साथ के मित्र लोकेश गौतम ने कहा कि उसके पास यह पुस्तक है। तब फिर क्या था, मैंने शाम को ही उससे इस पुस्तक को हथियाया और पढना शुरू किया।

लेखक के अनुसार यह कहानी एक ऐसे राजा या कबीले के मुखिया के बारे में है जिसने अपने विरुद्ध खड़े हुए दस राजाओं के साथ युद्ध किया था और इसका वर्णन ऋग्वेद के सातवें मंडल के एक श्लोक में आता है। आगे भी कई मंडलों में इस युद्ध के बारे में जिक्र आता है। खैर मैं इस बात कि सच्चाई में नहीं जा पाया हूँ लेकिन ये मान के अगर चलूँ कि यह बात सच है तो पुस्तक पढने का मजा दोबाला हो जाता है। क्यूंकि कभी-कभी कुछ कहानियों को सिर्फ कहानी कि तरह ही नहीं पढ़ा जा सकता। इतिहास और मिथ पर आधारित कहानी को तो बिलकुल भी कहानी कि तरह नहीं पढ़ा जा सकता। उसको कहीं न कहीं महसूस करने से कहानी में रोमांच बना रहता है।

यह कहानी त्रित्शु काबिले के राजा या मुखिया सुदास नामक मुखिया की है। लेखक के अनुसार त्रित्शु कबीला वही क्षेत्र है जो वर्तमान में पंजाब कहा जाता है। चूँकि यह क्षेत्र उपजाऊ भूमि से भरा हुआ है इसलिए उसके करीबी राजाओं और कबीलों कि नज़र इस क्षेत्र पर है। ये सभी काबिले और राजा मिलकर एक साथ एक दिन त्रित्शु काबिले पर हमला बोल देते हैं। ऐसे में कैसे सुदास अपनी छोटी सी सेना के साथ इन दशों राजाओं का मुकाबला करता है। कैसे वह इन दस लालची राजाओं के भटक चुकी इन्द्रियों के खिलाफ युद्ध लडेगा।
जहाँ सुदास के सामने दश राजाओं को सैन्य बल था जो लगभग साठ हज़ार सैनिकों कि क्षमता रखता था वहीँ सुदास के पास सिर्फ तीन-चार हज़ार का ही सैन्य बल था। लेकिन सुदास के पास अपनी धरती के लिए मर मिटने वाले जाबाज थे। जहाँ दशों राजा और उसके प्रतिद्वंदी इस युद्ध के लिए साल भर से तैयारी कर रहे थे वहीँ सुदास को इस बात कि खबर भी नहीं थी कि अचानक एक दिन चारो ओर से दस राजाओं कि सैन्य शक्ति उसे अपने घेरे में ले लेगी।
चूँकि सुदास क्षत्रिय था तो उसका कर्तव्य था कि वह उनसे युद्ध करे। सुदास युद्ध करता है और बहुत ही खूबसूरती और जज्बे के साथ अपने जीवन को अपने मातृभूमि को समर्पित कर देता है।
इस उपन्यास कि पूरी कहानी सुदास और दशाराजन युद्ध कि चारो ओर ही घुमती रहती है। कहानी को लेखक ने बहुत ही सुन्दर और रचनात्मक रूप से प्रस्तुत किया है। ऐसी प्रस्तुति है कि अहसास ही नहीं होता कि मैं एक मायथो-लॉजिकल कहानी पढ़ रहा हूँ। उपन्यास में लेखक वही वातावरण उत्पन्न किया है जो वैदिक काल में हुआ करता था। सभी किरदारों के साज-सज्जा और भेष-भूषा का भी खास ख्याल रखा गया है। उपन्यास में दो किरदार और है जो युद्ध कि भूमिका निभाते हैं – महर्षि वशिष्ट और महर्षि विश्वामित्र। महर्षि वशिष्ट, त्रित्शुओं के गुरु थे तो महर्षि विश्वामित्र पुरे भारत वर्ष के गुरु थे।

अशोक बैंकर पर जो मैंने भरोसा किया, जो इस पुस्तक पर भरोसा किया, पढना शुरू करके, वह सफल रहा। क्यूंकि इस पुस्तक ने मुझे शुरू से अंत तक बाँध कर रखा। ज्यों ज्यों कहानी युद्ध भूमि कि और बढ़ी और जब युद्धभूमि कि घटनाओं को लेखक ने मेरे सामने प्रतिबिंबित किया तो मैं अचंभित हो गया। अशोक बैंकर जी कि इस पुस्तक ने इस बार निराश नहीं किया। क्योंकि इनके द्वारा लिखी गयी पिछली पुस्तक “Red Blood Saari” ने मुझे बहुत निराश किया था।


खैर, यह मेरी उन सभी मित्रों को सलाह है जो पुस्तकें पढना पसंद करते हैं कि आप यह पुस्तक भी एक बार पढ़ कर देखें।

आभार 
राजीव रोशन 

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